Tuesday, December 10, 2013

ऋषि वाणी - मेरी कलम से

ऋषि वाणी । मेरी कलम से
स्वस्थ सुखी रहने के सर्वसुलभ उपाय:-

आज मनुष्य स्वास्थ और सुख की चाह में भटकता फिर रहा है फिर भी उसकी इच्छा पूरी नहीं होती । यहां स्वस्थ सुखी रहने के कुछ आसान तरीके बताए गए है, जिसमें न किसी गुरु की आवश्यकता है, न ही कहीं भटकने की, न ही कोई पैसा खर्च करने की, न ही किसी ज्ञान की, न ही समय की और न कुछ करने की, बस थोड़ा सा अपनी दिनचर्या में परिवर्तन कर अपनी सोच को बदलें और स्वस्थ सुखी दीर्धायु जीवन व्यतीत करें।

१. अपनी कमाई से कम में अपना निर्वाह करना सीखें कमाई का एक तिहाई प्रतिमाह बचाने का प्रयास करें। कभी कर्ज न लें, न ही किसी से प्रतिस्पर्धा करें अपनी परिस्थिति से हमेशा संतुष्ट रहें।

२. नियमित दिनचर्या अपनायें चाहे कार्य दिवस हो या छुट्टी का दिन दिनचर्या न बदलें प्रयास करें कि इसमें कभी पांच मिनिट का भी फर्क न आए (यदि साल में एक दो बार कोई बाधा आती तो इससे कोई फर्क नही पड़ेग) । २-३ माह ही नियमित प्रयास करना होता है इसके बाद जीवन भर के लिए यह आदत में बदल जाता है।

३. सुबह ब्रह्म मुहूर्त (सुबह ४ से ७ गर्मी में, सुबह ५ से ८ ठंड में) उठकर शौच स्नान आदि से निवृत हो कम से कम १५-२० मिनिट ईश्वर या इष्ट की आराधना अवश्य करें। इसके लिए इष्ट के सामने शुद्ध घी का दीपक और मन पसंद धूप बत्ती जलाकर शांत मन से बैठकर पूजा आराधना करें, हो सके तो एक माला गायत्री मंत्र का जप करें। इससे आप दिन भर तरोताजा महसूस करेगें आलस और थकान महसूस नहीं होगी।

४. भोजन ईश्वर का प्रसाद है यह जीने के लिए आवश्यक है हमेशा इसी उद्देश्य से भूख से कुछ कम सात्विक भोजन करें। भोजन पर कोई टिप्पणी न करें। इस धारणा से भोजन करने वाले को “कि हम जितना अधिक और पौष्टिक भोजन करेंगें उतने ही ताकतवर बनेगें” उनको भोजन खा जाता है। आप दिन भर में जितना केलोरी खपत कर सकते है उतना ही खाएं। दूध मलाई खाकर एसोआराम करने वालों से सूखी रोटी खाकर मेहनत करने वाले ज्यादा ताकतवर होते हैं।

५. समस्त जगत को ईश्वर का रूप मानकर श्रृद्धा पूर्वक व्यवहार करें।यदि आप मंदिर में जाकर मूर्ति की पूजा करते हैं और बाहर आकर कुत्ते
को डंडा मारते हैं तब आपने पूजा भी ईश्वर की और डंडा भी ईश्वर को मारा इसका अच्छी तरह ध्यान रखें। प्रकृति, वनस्पिति, जीव जन्तु, एवं मानवीय संबंधों को स्वार्थ, भौतिक सुख सुविधा, धन एवं संपत्ति से अधिक महत्व दें। कोई ऐसा काम न करें जिससे किसी को दुख पहुंचे या किसी की कोई हानि हो ।

६. घर के समस्त कार्य स्वयं करें नौकरों के भरोसे न रहें। अपने बच्चों को भूलकर भी नौकरों के भरोसे न छोड़े। वर्तमान समय में यह
बिलकुल उपयुक्त नहीं। यदि आप उपरोक्त सरल नियमों का पालन कर सकते हैं तो जीवन भर स्वस्थ सुखी और निश्चिंत जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

हरी ॐ तत्सत
रेमेडियल एस्ट्रोलोजर ऋषि पंड्या
हेड ऑफिस । वड़ोदरा गुजरात
ब्रांच ऑफिस । गांधीनगर गुजरात
9824162904

वास्तु शास्त्र - मेरी कलम से

वास्तु शाश्त्र – मेरी कलम से 
वास्तु शाश्त्र के सिद्धांत के अनुसार अगर जो मकान बनाया जाये तो उनमे रहें वाले व्यक्ति के जीवन में खुशहाली, समृद्धि और उन्नति आती हे | आज हम बात करेंगे मकान की मुख्य दरवाजे की – मकान में मुख्य दरवाजे की बहोत ही महत्त्व पूर्ण भूमिका होती हे | 

वास्तुशाश्त्र के अनुसार मकान का मुख्य द्वार किस दिशा में लगाया हे उस पर से गृह स्वामी को शुभाशुभ फल की प्राप्ति होती हे | अगर घर में शुभ दिशा में द्वार हे तो घर के सभी सदस्य को शुभ फल की प्राप्ति होगी और अगर अशुभ दिशा में हे तो अवश्य ही अशुभ फल की प्राप्ति होगी | आप चाहे तो घर में मुख्य द्वार की दिशा जन कर उसमे बदलाव ला कर शुभ फल की प्राप्ति कर शकते हे

यहाँ में द्वार की दिशा के अनुसार फल का वर्णन कर रहा हु – कृपया लाभ उठाये

पूर्व दिशा - शुभ द्वार, उच्च विचारों की प्राप्ति और शुभता की प्राप्ति
पूर्व ईशान – सर्व श्रेष्ठ और सौभाग्यदायक
पूर्व अग्नि – अशुभ, वैचारिक मतभेद, बार बार चोरी होना, संतान के लिए कष्ट कारी
पश्चिम वायव्य - सर्व कार्य के लिए शुभदायक
पश्चिम नैरुत्य – अशुभ, आर्थिक परेशानी, घर के मुख्य व्यक्ति के लिए ज्यादा अशुभ
उत्तर इशान – शुभ श्रेष्ठ, आर्थिक सफलता
उत्तर वायव्य – अशुभ, धनहानि, चंचलता, तनाव में वृद्धि
दक्षिण अग्नि – शुभ, आर्थिक लाभ, स्वास्थ्यदायक
दक्षिण नैरुत्य – अशुभ, आर्थिक विनाश, गृहिणी के लिए कष्टप्रद
पश्चिम – शुभ फलदायक
उत्तर – अत्यंत शुभ फलदायक

यहाँ उल्लेख हे की पूर्व ईशान मतलब इशान कोने में जो दरवाजा हे जो जिसका मुख पूर्व दिशा में हे उशे पूर्व ईशान कहते हे : अतः आपको उसी प्रकार आपको बाकि दिशाओ के लिए समजना हे

और अगर आपका द्वार गलत दिशा में हे तो कृपया वहा द्वार दोष निवारण यन्त्र स्थापित करे और सम्पूर्ण रूप से लाभ उठाये

हरी ॐ तत्सत
रेमेडियल एस्ट्रोलोजर ऋषि पंड्या
हेड ऑफिस – वड़ोदरा गुजरात
ब्रांच ऑफिस – गांधीनगर गुजरात
Contact - 9824162904

नवग्रह यन्त्र



गोल्ड प्लेटेड नवग्रह यन्त्र 

यह यन्त्र प्रतियोगिता – क़ानूनी मसले और दुश्मनों पर विजय दिलाता हे
यह गोल्ड प्लेटेड नवग्रह यन्त्र सम्पूर्ण रूप से नो ग्रहों के आशीर्वाद हे
नवग्रह ज्योतिष के अनुसार अवकाशीय मंडल का प्रतिनिधित्व करते हे और उनका प्रभाव सम्पूर्ण रूप से सप्ताह के सतो दिनों पर रहता हे और यह यन्त्र के माध्यम से किसी के भी जीवन को प्रभावित किया जा शकता हे |

यह नवग्रह यन्त्र की पूजा से हमारी कुंडली के लाभकारी ग्रहों को मजबूत और उनके सकारात्मक प्रभाव को बढाती हे और कुंडली के हानिकारक ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव को संतुलित करता हे क्यों किये अत्यधिक उपयोगी और लाभकारी गोल्ड प्लेटेड नवग्रह यन्त्र हे


नवग्रह यंत्र में मुख्य लाभ

• ९ ग्रहों के अशुभ प्रभावों से बचाता हे
• आपके जीवन में सम्पूर्ण सफलता दिलाके आपको खुश करता हे
• आपके सोहरत बढ़ता हे और आपको प्रसिद्द बनता हे
• आपके घर के वातावरण से नकारात्मक उर्जा को निकलता हे
• यह यंत्र आप पर डाली गई सब बुरे को निकलता हे
• आपको स्वास्थ्य और धन देता हे
• आपको सम्पूर्ण रूप से मानसिक शांति प्रदान करता हे
• वैवाहिक जीवन में सम्पूर्ण रूप से सफलता प्राप्त करवाता हे

अब ये गोल्ड प्लेटेड यंत्र आप घर बैठे ही मंगवा शकते हे
यह यन्त्र आपको नवग्रह के सवा लाख मंत्रो के साथ अभिमंत्रित कर के होम कर आप तक पहोचाया जायेगा 

यह यन्त्र की साइज ६ बाय ६ इंच रहीगी और यह यंत्र को किस प्रकार रखना हे और किस प्रकार उसका पूजन करना हे यह सम्पूर्ण रित आपको यंत्र के साथ ही प्राप्त होगी ||

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भारत के आलावा अन्य देशो के लिए कोरियर चर्जिस एक्स्ट्रा होगा


हरी ॐ तत्सत
रेमेडियल एस्ट्रोलोजर ऋषि पंड्या
हेड ऑफिस – वड़ोदरा गुजरात
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9824162904

वशीकरण कवच यन्त्र


वशीकरण कवच

आकर्षक व्यक्तित्व के निर्माण का एक सरल एवं आध्यात्मिक उपाय

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प्रसादी मूल्य

नार्मल कवच Rs 750/-
मध्यम कवच Rs 1470/-
स्टैण्डर्ड कवच Rs 2100/-

हरी ॐ तत्सत
रेमेडियल एस्ट्रोलोजर ऋषि पंड्या
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Thursday, April 5, 2012

एक चमत्कारिक जन्मपत्रिका जिसमे आपजो जीवन की हर समस्या का समाधान मिलेगा ( एक नया कदम जो हर दम सफलता देगा )

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          एक चमत्कारिक जन्मपत्रिका

      जो आपको सफलता के शिखर पर बिठा देगा 

 लाल किताबकुंडली - वैदिक कुंडली और अंकज्योतिष के   
 अनुसार आपका सम्पूर्ण विवरण फलादेश एवं उपाय 



क्या इतनी सारी जानकारी और जीवन भर के उपाय आपको कही मिल शकते हे ? कम से कम एक बार निन्म विगत अवश्य पढ़े सायद आपको कुछ ऐसा मिले जिसकी आपको बरसों से तलाश थी ... !!!!!!!!!!!!!
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    लाल किताब कुंडली – वैदिक कुंडली और अंकज्योतिष के अनुसार यह सम्पूर्ण पत्रिका में आपको क्या मिलेगा और उसका उपयोग कैसे करे और लाभ कैसे पाए || यहाँ आपको लालकिताब कुंडली के साथ फलादेश और उपाय के साथ वैदिक कुंडली के फलादेश और उपाय प्राप्त होंगे || लालकिताब एक ज्योतिष का महान ग्रन्थ हे जो सम्पूर्ण रूप से ज्योतिष और उसके उपायों के लिए प्रचलित हे || आप सभी जनते हे की कुंडली में काफी बड़े बड़े अच्छे और बुरे योग होते हे और बुरे योगो के लिए बड़े बड़े विधान करना आम आदमी के लिए थोडा मुश्किल होता हे, यहाँ लालकिताब और वैदिक ज्योतिष के अनुसार आपको चाहे कैसा दोष हे आप उसके छोट छोट उपाय कर अपने जीवन में सम्पूर्ण रूप से सफलता प्राप्त कर शकते हे ||

यहाँ यह लालकिताब कुंडली में शुरु मे आपको ज्योतिष सारणी के साथ लालकिताब कुंडली और कुछ अन्य कुंडली प्राप्त होगी ज्योतिषीय गणना के लिए जरुरी हे. जातक के बारे में लालकिताब के अनुसार सामान्य जानकारी – फलादेश | सभी भाव में बैठे हुये ग्रह ( सभी ग्रहों का अलग अलग ) का फलादेश और ग्रह के अशुभता शुभता में बदलने के लिए उपाय और जीवन में रखने योग्य सावधानिया | विशेष रूप से लालकिताब का ग्रह फल और उपाय और परहेज | लालकिताब से जीवन के विभिन्न पहलुओ से सम्बंधित कारण और उपाय – शिक्षा से सम्बंधित भिवष्यवाणी और उपाय – स्वास्थ्य से समबंधित कुछ महत्वपूर्ण योग और उपाय – धन व्यापार रोजगार से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण योग और उपाय – लालकिताब से मकान के सम्बंधित योग सावधानिय एवं नियम – विवाह, स्त्री और गृहस्थ-सुख से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण योग और उपाय – संतान से सम्बंधित भविष्यवाणी और उपाय – आपकी कुंडली में यात्रा से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण योग और उपाय – लालकिताब से अन्य महत्वपूर्ण भाविश्फल – अंधे ग्रहों की कुंडली फलादेश – आधे अंधे ग्रहों की कुंडली फलादेश – धर्मी टेवा कुंडली फलादेश – नबालीग टेवा कुंडली फलादेश - लालकिताब से राजयोग का फल – लालकिताब से ऋण और उसके उपाय – लालकिताब में वर्जित और अवर्जित उपाय – लाकिताब से एक साथ बैठे उए ग्रहों का फल – लालकिताब से गोचर शनि साडेसाती और ढाई साल की पनोतीका फल और उपाय – लालकिताब में विशोतरी दशा में १२० वर्ष का फलादेश और सभी महा एवं अंतर दशा के उपाय – विशेष रूप से निन्म फलादेश भी यहाँ प्राप्त होगा   आपके ग्रहों के अनुसार आपकी शारीरिक संरचना – आपकी मानसिक स्थिति – आपके गुण अवगुण – आपके विशेष लक्षण – आपका रोजगार – आपके लिए शुभ एवं अशुभ ग्रह – कुंडली  में लागु हो रहे धन योग की विस्तृत जानकारी – कुंडली में लागू हो रहे अनिष्ट योग की जानकारी – जन्मकालीन संवास्तर का विशेष रूप से विवरण – जन्मकालीन सौर अयन का भविष्यफल – जन्म कालीन रुतुचक्र का भविष्य फल – जन्मकालीन पक्ष का भविष्य फल – जन्म कालीन दिन का भविष्य फल – दिन या रत के जन्म का भविष्य फल – जन्म कालीन सूर्यसिद्धान्त योग का भविष्य फल – जन्म कालीन तिथि का भविष्य फल – जन्म कालीन करण का भविष्य फल – जन्म कालीन नक्षत्र का भविष्य फल – जम कालीन लग्न का भविष्य फल – जन्म कालीन होरा का भविष्य फल – जन्म कालीन देष्काण का भविष्य फल – जन्म कालीन प्राण पद के भविष्यफल – जन्म कालीन गुलिक से भविष्य फल – जन्म कालीन देह राशि से भविष्य फल – जन्म कालीन गण से भविष्य फल – जन्म कालीन वर्ण से भविष्य फल – जन्म कुंडली के आधार पर शारीर के विभिन्न अंगों का विश्लेषण जैसे – शारीर की बनावट – कद काठी और त्वचा का रंग – संभावित कद का अनुमान वयस्क होने पर – शारीर के स्थूल काय होने का अनुमान वयाश्क होने पर – जीभ दन्त और बोलने की क्षमता का भविष्यफल – बाहे हाथ और कंधे की संचरचना का भविष्यफल – ह्रदय और पीठ की स्थिति का अनुमान – उदार पेट और पाचन किर्या का भविष्यफल – शारीर के ग्राही, अवशोषि और उत्सर्गी अंगों का भविष्यफल – जांघ, गुटनो, टांगो और पंजो का अनुमान  शिक्षा की सम्भावना की जाँच जैसे शिक्षा में बाधाओ का भविष्यफल – अनोपचारिक शिक्षा – लिखावट का भविष्यफल – बुद्धि मेधा और योग्यता का भविष्यफल – उच्च शिक्षा के योग और भविष्यफल – व्यवसाय रोगगार की संभावनाओ की और भविष्य फल – आपके ग्रहों के अनुसार आपके विवाह और वैवाहिक जीवन का भविष्य फल – जातक के बारे में स्वास्थ्य और बीमारियो के बारे में सम्पूर्ण विश्लेषण – आपके ग्रहों के अनुसार यात्रा भ्रमण और विदेश योग का भविष्यफल आपके ग्रहों के अनुसार शुभ दिशा का चुनाव  -  जन्म समय की कुंडली के अनुसार कुछ महत्वपूर्ण योग – सफल काम योग – योग – सत कलत्र योग – तीव्र बुद्धि योग – दामिनी योग – जन्म कालीन नवग्रहों  की स्थिति से भविष्य फल - लालकिताब के अनुसार कुंडली में कालसर्प हे या नहीं और उसका उपाय – लालकिताब के अनुसार मांगलिक दोष और उपाय – अंकशास्त्र के अनुसार रत्न मंत्र यन्त्र रुद्राक्ष और उपाय  और भी अंक ज्योतिष बहोत सारी जानकारी जैसे आपके लिए कोनसा देश और कोनसा शहर लाभदाई हे और बहोत कुछ – वैदिक कुंडली और वैदिक फलादेश और साथै में वैदिक रीती से सम्पूर्ण जीवन भर की साडेसाती का फलादेश और उपाय – आपकी कुंडली के अनुसार उपयुक्त रत्न का सुजाव – योग करक ग्रह के रत्न का सुजाव – जन्म राशि के आधारित रुद्राक्ष का सुजाव – रुद्राक्ष धारण करने की विधि सहित – आखिर में लालकिताब का गोचर वर्ष फल और शुभ और अशुभ ग्रहों के उपाय कर अपने वर्ष को सफलता दायक बनाये |

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मुद्रा ज्योतिष कार्यालय – वड़ोदरा – गुजरात
रेमेडियल एस्ट्रोलोजर ऋषि पंड्या – Mob : 9824162904



Tuesday, July 27, 2010

व्यक्ति गत मार्गदर्शन हेतु उपयोग में लाये




We cannot change the circumstances in which our soul chose to be born, but we can definitely change the circumstances in which we grow.
हर समस्या का समाधान संभव नहीं हे, बहोत ही कम ऐसी समस्याये हे जिनका समाधान कर शकते हे .. यहाँ सभी लेख अलग अलग सूत्रों और माध्यम से प्राप्त हुए हे - यदि कोपीराइट भंग होता हो तो माफ़ कर दे ... हमारा उद्येश मात्र आम जानता के लाभार्थ ही हे .....


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श्रीयंत्र को यंत्रराज क्यों कहते हे ?    Date : 17-03-2012
प्रणाम दोस्तों 


ज्यादातर लोग श्रीयंत्र को लक्ष्मी प्राप्ति का ही माध्यम समजते हे परन्तु श्रीयंत्र अपने आप में सारे संसार का सुख देने में सामर्थ्य रखता हे | एक पौराणिक खाता के अनुसार लक्ष्मी जी पृथ्वी से रुष्ट हो कर वैन्कुठ चली गई | तो लक्ष्मीजी की अनुपस्थिति में पृथ्वी पर अनेक समस्याए उत्पन्न होगई तब महर्षि वशिष्ठ और श्री विष्णु ने लक्ष्मीजी को बहोत मनाया फिर भी लक्ष्मी जी नहीं मानी तब जाके देवगुरु बृहस्पति ने एक उपाय किया, लक्ष्मीजी को आकर्षित करने के लिए श्रीयंत्र की रचना की और उसका स्थापन और पूजन का उपाय बताया | तब जाके लक्ष्मीजी को न चाहते हुवे भी विवश हो कर पृथ्वी पर आना पड़ा क्यों की - लक्ष्मीजी ने अपने स्वयं के मुख से कहा " श्रीयंत्र ही मेरा आधार हे और यही श्रीयंत्र में मेरी आत्मा निवास करती हे इस लिए मुझे आना ही पड़ा "


एक अन्य कथा में श्रीयंत्र का सम्बन्ध आध्यशंकराचार्य से जोड़ा गया हे | एक बार विश्व में बहोत परेशानी व्याप्त हो गई तब आध्यशंकराचार्य जी ने आशुतोष शिवजी से विश्वकल्याण के लिए उपाय पूछा तो शिवजी ने श्रीयंत्र और श्रीविद्या प्रदान करते हुवे कहा की श्रीविद्या की साधना जाननेवाला मनुष्य अपर यश और लक्ष्मी का स्वामी होगा जबकि श्रीयंत्र का पूजन करने वाला प्रत्येक प्राणी सभी देवताओ की आराधना का फल प्राप्त करेगा क्यों की इस यंत्र राज " श्रीयंत्र " में सभी देवी देवताओ का वास हे .... हरी ओम तत्सत

मेरे सभी दोस्तों से मेरा नम्र निवेदन हे की हो शके तो जीवन में एक बार सम्पूर्ण रूप से श्रीविद्या के तहद एक श्रीयंत्र वैदिक रीती से बनवाकर अपने घर में स्थापन करे और यह श्री यन्त्र का नित्य वैदिक पूजन करे और हवन द्वारा देवताको को भोग प्रदान करे .. अवश्य ही लक्ष्मी की महेर होगी .. मेरा स्यवंम का अनुभव हे ... कृपया लाभ उठाये 

रेमेडियल एस्ट्रोलोजर ऋषि पंड्या - वड़ोदरा - गुजरात



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आज से शारदीय नवरात्री आरम्भ हो रही हे मेरे सभी बंधू ओ से मेरा नम्र निवेदन हे - कृपया आप हो शके तो यह नवरात्री में शक्ति की उपासना कर अपने आप को धन्य बनाये - रक सरल तरीका माँ की उपासना का - मूल मन्त्र की रोज ९ माला सुबह शाम अवश्य करे

नवरात्र के प्रथम दिन जगदम्बा का प्रथम स्वरूप देवी शैलपुत्री की पूजा होती है l लोक मान्यता है कि देवी शैलपुत्री अगर खुश हो जाएँ तो जमीन-जायजात और मान सम्मान में बढ़ोत्तरी होती है | माँ भवानी जगदम्बा का पहला रूप माँ शैलपुत्री है | माँ शैलपुत्री शक्ति कि देवी, शक्ति का स्वरुप हैं | माँ शैलपुत्री वो देवी हैं जिनके नाम मात्र से बड़े बड़े राक्षस काँप उठे है | देवी शैलपुत्री की उपासना से समस्त संसार को वश में किया जा सकता है | वो शैलपुत्री जिनके सामने इस संसार में कोई ऐसा नहीं जो टिक सके | माँ शैलपुत्री हिमालय कि बेटी हैं इसीलिए इनका नाम पड़ा शैलपुत्री | शैलपुत्री को हिमालय कि तरह ही शक्ति का स्वरुप माना जाता है | माँ का शैलपुत्री स्वरुप मानवों को पर्यावरण संतुलन की ओर प्रेरित करता है l प्रकृत की रक्षा की ओर अग्रसर करता है |

मूल मन्त्र : ओम एम ह्रीं कलीम चामुण्डाये विच्ये

यह मन्त्र को किस प्रकार बोलना हे निचे दिए गई क्लिप को ओन करे











Wednesday, July 7, 2010

शिव महिमा स्तोत्र

शिव महिमा स्तोत्र
महिम्नः पारं ते, परमविदुषो यज्ञसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीना मपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ।
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामधि गृणन्
ममाप्येषः स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥१॥
अतीतः पंथानं तव च महिमा वाड् मनसयो
रतद्व्यावृत्यायं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥२॥
मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत
स्तव ब्रह्मन्किं वा गपि सुरगुरोर्विस्मयपदम् ।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः
पुनामीत्यर्थेस्मिन् पुरमथनबुद्धिर्व्यवसिता ॥३॥
तवैश्चर्यें यत्तद् जगदुदयरक्षाप्रलयकृत
त्रयी वस्तु व्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु ।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं
विहंतुं व्योक्रोशीं विदधत इहै के जडधियः ॥४॥
किमिहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ।
अतकर्यैश्वर्येत्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः
कुतर्कोडयंकांश्चि न्मुखरयति मोहाय जगतः ॥५॥
अजन्मानो लोकाः किमवयवंवतोडपि जगता
मधिष्ठातारं किं भवविधिरनादत्य भवति ।
अनीशो वा कुर्याद भुवनजनने कः परिकरो
यतो मंदास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥६॥
त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ।
रुचीनां वैचित्र्या दजुकुटिलनानापथजुषां
नृणामेको गम्य स्त्वमसि पयमामर्णव इव ॥७॥
महोक्षः खड्वांगं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चेतीय त्तव वरद तंत्रोपकरणम् ।
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भव द्भ्रूप्रणिहितां
नहि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ॥८॥
ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वद्ध्रुवमिदं
परो ध्रोव्याध्रोव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ।
समस्तेडप्येतस्मि न्पुरमथन तैर्विस्मित इव
स्तुवंजिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ॥९॥
तवैश्वर्यं यत्ना द्यदुपरि विरिंचिर्हरिरधः
परिच्छेतुं याता वनलमनलस्कंधवपुषः ।
ततो भक्तिश्रद्धा भरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत्
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिने फलति ॥१०॥
अयत्नादापाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं
दशास्यो यद्बाहू नभृन रणकंडुपरवशान् ।
शिरःपद्मश्रेणी रचितचरणांभोरुहबलेः
स्थिरायास्त्वद्भक्ते स्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम् ॥११॥
अमुष्य त्वत्सेवा समधिगतसारं भुजवनं
बलात्कैलासेडपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः ।
अलभ्यापाताले डप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि
प्रतिष्ठा प्रत्वय्या सीद्ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः ॥१२॥
यदद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सती
मधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयस्त्रिभुवनः ।
न तच्चित्रं तस्मिंन्वरिवसितरि त्वच्चरणयो
र्न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥१३॥
अकाण्डब्रह्माण्डक्षयचकितदेवासुरकृपा
विधेयस्यासीद्यस्त्रिनयविषं संह्रतवतः ।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो
विकारोडपि श्लाध्यो भुवनभयभंगव्यसनिनः ॥१४॥
असिद्धार्था नैव कवचिदपि सदेवासुरनरे
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः ।
स पश्यन्नीश त्वामितरसरुरसाधारणमभूत्
स्मरः स्मर्तव्यात्मा नहि वशिषु पथ्यः परिभवः ॥१५॥
मही पादाधाताद् व्रजति सहसा संशयपदं
पदं विष्णोर्भ्राम्यद्भुजपरिघरुग्णग्रहगणम् ।
मुहुद्यौंर्दोस्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥१६॥
वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदष्टः शिरसि ते ।
जगद् द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमि
त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः ॥१७॥
रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो
रथाडगे चन्द्रार्कौ रथचरणपाणिः शर इति ।
दिधक्षोस्ते कोडयं त्रिपुरतृणमाडम्बरविधिर्
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः ॥१८॥
हरिस्ते साहस्त्रं कमलबलिमाधाय पदयो
यदिकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम् ।
गतो भकत्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम् ॥१९॥
क्रतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते ।
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवं
श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दटपरिकरः कर्मसु जनः ॥२०॥
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता
मृषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः ।
क्रतुभ्रंषस्त्वत्तः क्रतुफलविधानव्यसनिनो
ध्रुवं कर्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः ॥२१॥
प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा ।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतंममुं
त्रसन्तं तेडद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥२२॥
स्वलावण्याशंसाधृतधनुषमह्नाय तृणवत्
पुरः प्लुष्टं दष्टवा पुरमथन पुष्पायुधमपि ।
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत देहार्धघटना
दवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः ॥२३॥
स्मशानेष्वाक्रीडा स्महर पिशाचाः सहचरा
श्चिताभस्मालेपः स्तगपि नृकरोटीपरिकरः ।
अमंगल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं
तथाडपि स्मर्तृणां वरद परमं मंगलमसि ॥२४॥
मनः प्रत्यक्चित्ते सविधमवधायात्तमरुतः
प्रह्रष्यद्रोमाणः प्रमदसलिलोत्संगितदशः ।
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्ज्यामृतमये
दद्यत्यंतस्तत्त्वं क्रिमपि यमिनस्तत्किल भवान् ॥२५॥
त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवह
स्त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च ।
परिच्छिन्नामेवं त्वयिपरिणता बिभ्रतु गिरं
न विद्मस्तत्तत्वं वयमिह तु यत्त्वं न भवसि ॥२६॥
त्रयीं तिस्त्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरा
नकाराद्यैर्वर्णै स्त्रिभिरभिदधत्तीर्ण विकृतिः ।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः
समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम् ॥२७॥
भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सहमहां
स्तथां भीमशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् ।
अमुष्मिन्प्रत्येकं प्रवितरति देव श्रुतिरपि
प्रियायास्मै धाम्ने प्रणिहितनमस्योडस्मि भवते ॥२८॥
नमो नेदिष्ठाय प्रियदवदविष्ठाय च नमो
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः ।
नमोवर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठा च नमः
नमः सर्वस्मै ते तदिदमितिशर्वाय च नमः ॥२९॥
बहलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः
प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमो नमः ।
जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥३०॥
कृशपरिणति चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं
क्व च तव गुणसीमोल्लंधिनी शश्वद्रद्धिः
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्
वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम् ॥३१॥
असितगिरिसमंस्यात् कज्जलं सिंधुपात्रे
सुरतरुवरशाखा लेखिनी पत्रमुर्वि ।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणाना मीश पारं न याति
असुरसुरमुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दुमौले
र्ग्रथितगुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य ।
सकलगणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानो
रुचिरमलधुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार ॥३३॥
अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्
पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्यः ।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाडत्र
प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान्कीर्तिमांश्च ॥३४॥
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः ।
अघोरान्नापरो मंत्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥३५॥
ीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः ।
महिम्नस्तवपाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥३६॥
कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः
शिशुशशिधरमौलेर्देव देवस्य दासः ।
स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्
स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्यदिव्यं महिम्नः ॥३७॥
सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुं
पठति यदि मनुष्यः प्रांजलिर्नान्यचेताः ।
व्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥३८॥
आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गंधर्वभाषितम् ।
अनौपम्यं मनोहारिशिवमीश्वरवर्णनम् ॥३९॥
इत्येषा वाडमयी पूजा श्रीमच्छंकरपादयोः ।
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ॥४०॥
तव तत्त्वं न जानामि कीद्शोडसि महेश्वर ।
याद्सोडसि महादेव ताद्शाय नमो नमः ॥४१॥
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते ॥४२॥
श्री पुष्पदंतमुखपंकजनिर्गतेन
स्तोत्रेंण किल्बिहरेण हरप्रियेण ।
कंठस्थितेन पठितेन समाहितेन
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ॥४३॥